स्मार्ट सिटी इंडेक्स 2०2०: शहरों पर लगा दाग


इंस्टिट्यूट फॉर मैनेजमेंट डिवेलपमेंट (स्विट्जरलैंड) ने सिंगापुर यूनिवर्सिटी फॉर टेक्नॉलजी एंड डिजाइन के साथ मिलकर 2०2० का जो स्मार्ट सिटी इंडेक्स (एससीआई) जारी किया है, उसमें भारत के चार शहर शामिल हैं। और खास बात यह कि चारों की रैंकिंग में पिछले साल के मुकाबले अच्छी-खासी गिरावट दर्ज हुई है। इसके कारणों पर जाने से पहले यह जानना जरूरी है कि एससीआई-2०2० इस मायने में भी विशिष्ट है कि इसे वैश्विक महामारी कोरोना के कहर के दौरान ही तैयार किया गया है। दुनिया भर के 1०9 शहरों में से हर शहर के 12० निवासियों से इस रिपोर्ट के लिए बातचीत अप्रैल और मई के महीनों में की गई जब लोग कोरोना के आतंक के साये में थे और ज्यादातर शहर लॉकडाउन से गुजर रहे थे।  स्वाभाविक रूप से इस इस रिपोर्ट में यह बात भी दर्ज हुई है कि अलग-अलग शहरों और वहां के निवासियों के नजरिये पर इस महामारी ने किस तरह का प्रभाव डाला है। वैसे इस इंडेक्स के संदर्भ में स्मार्ट सिटी का मतलब ऐसे शहरों से है जहां टेक्नॉलजी का इस्तेमाल शहरीकरण के फायदों को बढ़ाने और इसके नुकसानों को कम करने में होता हो। इसमें रैंकिंग तय करने के लिए आर्थिक और तकनीकी आंकड़े तो लिए ही जाते हैं, लेकिन खास जोर इस बात पर होता है कि शहर में रहने वाले नागरिक उसको कितना स्मार्ट मानते हैं। सो इन कसौटियों पर अपने देश के चारों शहर पहले से बदतर पाए गए। हैदराबाद 67वें से 85वें, नई दिल्ली 68वें से 86वें, मुंबई 78वें से 93वें और बेंगलुरु 79वें से 95वें नंबर पर आ गया। अन्य बातों के अलावा इसका एक सीधा मतलब यह भी है कि कोरोना के दौर में हमारे देश के शहरों में रह रहे लोगों का भरोसा खास तौर पर हिल गया था।  वैसे तो रिपोर्ट में भी यह बात आई है कि भारत के शहरों के कमजोर प्रदर्शन का मुख्य कारण यह है कि वे महामारी के लिए तैयार नहीं थे, मगर इस तथ्य का सबसे स्पष्ट प्रदर्शन शहरों से गांवों की ओर हुए अभूतपूर्व पलायन में हुआ। लॉकडाउन लागू होने के बाद छोटे बच्चों, महिलाओं और बुजुर्गों के साथ पैदल ही सैकड़ों किलोमीटर की यात्रा पर निकल पड़े लोगों की मन:स्थिति से बेहतर इसका सूचकांक भला और क्या हो सकता है। इससे यह सचाई खुलकर सामने आ गई कि गांवों से नाउम्मीद होकर शहरों में अपना जीवन खपा रहे लोगों के भीतर कोई भरोसा हमारे शहर नहीं जगा पाए हैं। एक ऐसे दौर में, जब कृषि का योगदान जीडीपी में लगातार कम होता जा रहा है और अभी की अपवाद स्थितियों को छोड़ दिया जाए तो इसे कम ही होते जाना है, शहरों की साख पर लगा यह बट्टा एक राष्ट्र के रूप में हमारे लिए भारी पडऩे वाला है। स्मार्ट सिटी इंडेक्स की कसौटियां अपनी जगह हैं, लेकिन हमारे शहरों को खुद पर लगा यह दाग धोने के लिए काफी मशक्कत करनी होगी।